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लुनयु[1]
 

बुध्द फा[2] सबसे अधिक प्रगाढ़ है; यह विश्व के सभी सिध्दान्तों में सर्वाधिक जटिल और असाधारण विज्ञान है। इस क्षेत्र में अनुसंधान करने के लिए, मनुष्य को आधारभूत तरीके से अपनी पारंपरिक विचारधारा को बदलना होगा। अन्यथा, विश्व का सत्य मनुष्य जाति के लिए सदैव एक रहस्य बना रहेगा, और साधारण व्यक्ति सदैव अपनी अज्ञानता की सीमा में भटकते रहेंगे।

तो, बुध्द फा सही अर्थ में है क्या? एक धर्म? एक दर्शनवाद? यह समझ केवल ''आधुनिक बुध्द मत के विद्वानों'' की है। वे इसका अध्ययन केवल सैध्दांतिक स्तर पर करते हैं और इसे समालोचनात्मक अध्ययन व तथाकथित शोध की श्रेणी में रखते हैं। वास्तव में, बुध्द फा सूत्रों तक सीमित वह संक्षिप्त अंश ही नहीं है, जो केवल बुध्द फा का प्रारंभिक स्तर है। कणों और अणुओं से ब्रह्मांड तक, सूक्ष्तम से स्थूलतम तक, बुध्द फा सभी रहस्यों को समझने की अंतर्दृष्टि है, इसमें सर्वस्व समाहित है और कुछ भी अछूता नहीं है। यह ब्रह्मांड की प्रकृति, ज़न-शान-रेन[3] है, जो विभिन्न स्तरों पर विभिन्न रूपों में व्यक्त होती है। इसी को ताओ विचारधारा में ताओ[4] कहते हैं, और बुध्द विचारधारा में फा कहते हैं।

वर्तमान मानव विज्ञान कितना भी विकसित क्यों न हो चुका हो, ब्रह्मांड के रहस्यों को यह अंशमात्र ही समझ पाया है। जब कभी हम बुध्द फा की विशिष्ट घटनाओं का उल्लेख करते हैं, ऐसे लोग हैं जो कहेंगे : ''अब हम इलेक्ट्रॉनिक युग में हैं और विज्ञान कितना विकसित हो चुका है। अंतरिक्षयान दूसरे ग्रहों पर जा चुके हैं, किन्तु आप अब भी उन पुराने अंधविश्वासों की बातें करते हैं।'' स्पष्ट रूप से कहा जाये तो, कम्प्यूटर कितने भी विकसित क्यों न हों, वे मानव मस्तिष्क से बराबरी नहीं कर सकते, जो आज भी एक अनसुलझा रहस्य है। अंतरिक्षयान कितनी भी दूरी तक चले जायें, किन्तु वे इस भौतिक आयाम को पार नहीं कर सकते जिसमें मानवजाति का अस्तित्व है। जो कुछ आज के मानव ज्ञान से समझा जा सकता है वह अभी भी अत्यंत सीमित और अपूर्ण है - यह विश्व की वास्तविक प्रकृति की सही समझ के आसपास भी नहीं है। कुछ लोग वस्तुनिष्ठ रूप से होने वाली अद्भुत घटनाओं के तथ्यों का सामना करने, जांचने या स्वीकार करने का साहस तक नहीं कर पाते, क्योंकि ये लोग अत्यंत रूढ़ीवादी हैं और पारंपरिक विचारधारा को बदलने के लिए अनिच्छुक हैं। केवल बुध्द फा विश्व, काल- आकाश, और मानव शरीर के रहस्यों को पूर्णतया उजागर कर सकता है। यह वास्तव में पवित्रता व सक्षम है, और यह उचित समझ प्रदान करते हुए सभी अवधारणाओं को हटा सकता है।

वर्तमान मानव विज्ञान के मार्गदर्शक सिध्दांत इसकी शोध और प्रगति को इस भौतिक जगत में सीमित करते हैं, जैसे एक विषय पर तब तक अध्ययन नहीं किया जायेगा जब तक उसे मान्यता न प्राप्त हो जाये - इसने यही मार्ग अपना लिया है। जैसे वे घटनाएं जो अस्पर्श और अदृश्य हैं, किन्तु वस्तुनिष्ठ रूप से विद्यमान हैं और हमारे भौतिक जगत में प्रत्यक्ष रूप से परावर्तित होती हैं, उन्हें स्वीकारा नहीं जाता और अज्ञात घटना मान लिया जाता है। हठी व्यक्ति तथ्यों के बिना ही यह तर्क अपना लेते हैं कि ये केवल प्राकृतिक घटनाऐं हैं। दूर की सोच वाले लोग अपने विवेक के विरुध्द चलते हुए इन सब घटनाओं को अंधविश्वास का नाम दे देते हैं। कम सोचने वाले लोग स्वयं को इन विषयों से इस बहाने के साथ अलग कर लेते हैं कि विज्ञान अभी इतना विकसित नहीं है कि इन्हें सुलझा सके। मनुष्य यदि स्वयं को तथा विश्व को नये तरीके से देख सके और अपनी कठोर धारणाओं में बदलाव ला सके, तो मनुष्य जाति के विकास में नये युग का पर्दापण होगा। बुध्द फा लोगों को अथाह और असीमित विश्व को समझने की अंर्तदृष्टि प्रदान कर सकता है। युगों-युगों से, केवल बुध्द फा ही मनुष्यों, भौतिक जगत के अनेक आयामों, जीवन और सम्पूर्ण विश्व को पूर्णतया समझा पाया है।

ली होंगज़ी
जून 2, 1992


[1] (“लुनयु”) टिप्पणी. नोट: यह और इसके बाद के सभी नोट अनुवादक के हैं.

[2] (“फा”) विधि, धर्म, सिध्दांत

[3] (“ज़न-शान-रेन”) ज़न का अर्थ है ''सत्य, सत्यता'', शान ''करुणा, अनुकंपा, समवेदना''; रेन ''सहनशीलता, सहिष्णुता, आत्म संयम''.

[4]  “ताओ” ''मार्ग'', ''रीति'', यह शब्द व्यक्ति के लिए भी प्रयोग हाता है जो ''ताओ प्राप्त'' कर चुका है